Raghavendra Stotra Sanskrit Pdf

Raghavendra Stotra Sanskrit pdf एक बहुत ही अच्छा पीडीऍफ़ फाइल है जिसको डाउनलोड करके नियमित राघवेन्द्र स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है |

राघवेन्द्र स्वामी के शिष्य अप्पणाचार्य द्वारा लिखा गया यह् स्तोत्र श्री राघवेन्द्र स्तोत्र कहलाता है | अप्पणाचार्य ने अपने गुरु की बहुत ही अच्छे तरीके से प्रसंशा किये हैं | इस स्तोत्र को गुरु स्तोत्र भी कहा जाता है |

Raghavendra Stotra Sanskrit pdf

राघवेन्द्र स्तोत्र को संस्कृत में लिखा गया है तथा इसका पीडीऍफ़ भी नीचे संलग्न किया गया है जो की फ्री में डाउनलोड कर सकते हैं |

श्री पूर्ण बोध गुरुतीर्थपयोब्धि पारा,

कामारी माक्ष विषमाक्ष शिरः प्रसंति |

पुर्वोत्तरा मित तरंग चरत सुहम्सा,

देवाली सेवित प्रान्गघ्रिप्यो जलग्ना ||१ ||

जीवेष भेद गुणपूर्ति जगत सुसत्वा,

निचोच्च भावमुख नक्र गनैह समेता |

दुर्वाध्य जपति गिलै गुरु राघवेंद्र,

वाग्देवता सरिदमुम् विमली करोतु ||२||

श्री राघवेन्द्र सकल प्रदाता,

स्वपाद कन्च स्व भक्ति मद्भ्यः |

अघाद्री सम्भेदन् दृष्टि वज्रः,

क्षमा सुरेंद्रो अवतु माम् सदायम् ||३||

श्री राघवेंद्रो हरि पाद कंज,

निशेवणाम् लब्ध समस्त सम्पतः |

देवस्व भावो दिविज ध्रुमोयम्,

इष्ट प्रदो में सततं स भूयात ||४||

भव्य स्वरूपों भव् दुख तुला,

संघाग्निचर्यह सुख धैर्यशाली |

समस्त दुष्ट ग्रहणी ग्रहेसो,

दुरुत्य योप प्लव सिंधु सेतु: ||५||

निरस्त दोषो निर्वाध्य वेष:,

प्रत्यर्थी मुकत्व निदान भाशः |

विद्त्व परिज्ञये महा विशेषो,

वाग्वैखरी निर्जित भव्य शेषः ||६||

संतान संपत् परिशुद्ध भक्ति,

विज्ञान वाग्देह सुपाट वादीन् |

दत्वा शरीरो त्थासमस्त दोषान्,

हत्वा स नोव्या गुरू राघवेन्द्र ||७||

यात्पादोद कस्च्यः सुर नदी मुख्यापगा सदिता,

संख्यानुत्तम पुण्य संघविल सत्प्याख्यत पुन्यावः |

दुस्ता पत्रय नाशनो भुवि महा वन्ध्या सुपुत्र प्रदो,

व्यंग स्वंगसमृद्दिदो ग्रह महा पापापह्स्तम् श्रये ||८||

यत्पाद कन्जरजसा परिभुषिताडंगा,

यत्पाद पद्मम्धुपायित मानसा ये |

यत्पाद पद्मपरि किर्तन जीर्ण वाच,

स्तदर्शनम् दुरित कानन दाव भूतम् ||९||

सर्व तंत्र स्वतंत्रोसौ श्रीमध्वमत वर्धनाह,

विजयीन्द्र कराब्जोत्थ सुधीन्द्र वर पुत्रकः |

श्री राघवेंद्रो यातिराट गुरुर्मे स्याभ्द्रयापः,

ज्ञानभक्ति सुपुत्रायुह यशः श्री पुन्यवर्धनह ||१०||

प्रतिवादि जय स्वांत भेद चिह्नादरो गुरु |

सर्व विद्या प्रवीणोंन्यो राघवेंद्रान्न विद्यते ||११||

अपरोक्षी कृत श्रीशः समुपेक्षित भावजः |

अपेक्षित प्रदातान्यो राघवेंद्रान्न विद्यते ||१२||

दयादा क्षिन्य वैराग्य वाक्पाटव मुखाकितः |

शापानुग्रह शाक्तोंयो राघवेंद्रान्न विद्यते ||१३||

अज्ञान विस्मृति भ्रान्ति संशयाप स्मृति क्षयाः,

तन्द्राकंपवचः कौंठयमुखा ये चेन्द्रियोद्ध्वाः|

दोषास्ते नशामायान्ति राघवेन्द्र प्रसादतः ||१४||

ओम् श्री राघवेंद्राय नमः इत्याष्टा क्षर मंत्रतः,

जपिताभ्दावितान्नित्यम् इष्टार्थः स्युर्नसंशयः ||१५||

हन्तु नः कायजान्दोषा नात्मात्मीय समुद्रवान |

सर्वानपि पुमुर्थान्श्च ददातु गुरुरात्मवित ||१६||

इति कालत्रये नित्यम् प्रर्थानाम् यः करोति सः |

इहामुत्राप्त सर्वेष्टो मोदते नात्र संशयः ||१७||

अगम्य महिमा लोके राघवेंद्रो महायशाः |

श्री मध्वमत दुग्दाब्धि चंद्रोवतु सदानघः ||१८||

सर्व यात्रा फलावाप्त्यै यथा शक्ति प्रदक्षिणं |

करोमि तव सिद्धस्य वृन्दावनगतम् जलं |

शिरसा धरयाम्य्द्य सर्व तीर्थ फलाप्तये ||१९||

सर्वाभीष्टार्थ सिद्ध्यर्थ नमस्कारम् करोम्यहम् |

तव सद्किर्तनम् वेदशास्त्रार्थ ज्ञान सिद्धये ||२०||

संसारे क्षय सागरे प्रकृतितोगाथे सदा दुस्तरे,

सर्वावद्य जल ग्रहैरनुपमैह कामादि भड्गा कुले |

नाना विभ्रम दुर्भमे मित भयस्तो मादि फेनोत्कटे,

दुखोत्क्रिष्ट विषे समुद्र गुरो मा मग्नरूपम् सदा || २१||

राघवेन्द्र गुरु स्तोत्रम् यः पठेद्ध्क्ति पूर्वकं |

तस्य कुष्ठादिरो गाणं निवृतिस्त्वर्य भवेत ||२२||

अन्धोअपी दिव्यदृष्टि स्यदेडमुकोअपि वाक्यति |

पूर्णायूह पुर्नसम्पति स्तोत्रस्यास्य जपाभ्द्वेत ||२३||

यः पिबेज्जल मेतेन् स्तोत्रेनैवाभि मंत्रितम् |

तस्य कुक्षिगता दोषा सर्वे नश्यन्ति तत् क्षणात ||२४||

यद् वृन्दावन मासाद्य पंगु खजोअपि वा जनः |

स्तो त्रेणानें यः कुर्यात्प्रदक्षिण नमस्कृति |

स जंघालो भावेदेव गुरुराज प्रसादतः ||२५||

सोम सूर्यो परागे च पुष्यार्का दिस्मागमे |

योनुत्त ममिदम् स्तोत्र मश्तोत्तर शतम् जपेत |

भूत प्रेत पिशाचादी पीड़ा तस्य न् जायते ||२६||

एतत स्त्रोतम् समुच्चार्य गुरोर्वृन्दा वनास्तिके |

दीप समयोजना ज्ञानम् पुत्र लाभो भवेद ध्रुवं ||२७||

परवादी जयो दिब्य ज्ञान भक्त्यादी वर्धनं |

सर्वा भिष्ट प्रवृद्धिस्स्यान्नात्र कार्या विचारणा ||२८||

राजचोर महा व्याघ्र सर्प नक्रादि पिडनम् |

न जयतेस्य स्तोत्रस्य प्रभावान्नात्र संशयः ||२९||

यो भक्त्या गुरु राघवेंद्र चरणदवन्द्वं स्मरण यः पठेत,

स्तोत्रं दिव्यमिदम सदा नहि भावेत्तस्या सुख़म् किन्चनः |

किम् त्विष्टार्थ समृद्धिरेव कमला नाथ प्रसादो दयात,

कीर्ति दिन्ग्विदिता विभुतिरतुला साक्षी हयास्योत्र हि ||३०||

इति श्री राघवेंद्रार्य गुरु राज प्रसादतः |

कृतं स्तोत्रमिदम् पुण्यं श्री मभ्दिह्र्यप्पणा भिदैह् ||३१||

पूज्याय राघवेंद्राय सत्य धर्मर्ताय च |

भजताम् कल्प वृक्षाय नमताम् कामधेनवे ||३२||

आपाद मौलिपर्यन्तं गुरुणामा कृतिम् स्मरेत |

तें विध्नः प्रणश्यन्ति सिद्धयन्ति च मनोरथः ||३३||

दुर्वादि ध्वांतरवये वैष्णवेन्दीव रेंदवे |

श्री राघवेन्द्र गुरुवे नामोस्त्यंत दयालवे ||३४||

मुकोअपि यत्प्रसादेन मुकुंद शयनाय ते |

राज राजायते रिक्तो राघवेन्द्रम् तमाश्रये ||३५||

|| इति श्री अप्पणाचार्य विरचितम् श्री राघवेन्द्र स्तोत्रं सम्पूर्णं ||

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